जवाहरलाल नेहरु का लालन-पालन बिल्कुल अंग्रेजी ढंग से हुआ और उनकी देख रेख के लिए अंग्रेजी आया रखी गई । हर साल जवाहर जी का हैप्पी बड्डे बहुत धुमधाम से मनाया जाता था और उस दिन उन्हें गेहुं तथा दुसरे अनाजों से तौला जाता और गरीबों में बांट दिया जाता । मां अपने लाडले को नहा-धुलाकर के के नए नए कपड़े पहनातीं , उन्हें सब से शानदार उपहार मिलते और फिर रात को दावत होती और वह भी मतलब ऐसी वैसी नहीं धुआंधार, जिसमें शहर के रईसों और वकीलों के अलावा मोतीलाल नेहरु के अंग्रेज दोस्त भी शामिल होते थे ।

जवाहरलाल को नार्मल बच्चों की तरह स्कूल  नहीं भेजा गया , उनकी पढ़ाई-लिखाई अंग्रेज महिलाओं के द्वारा घर पर ही करवाई गई । जब वह 11 साल के हुए तो एफ.टी. ब्रुक्स नाम के एक अंग्रेज अध्यापक को उनकी शिक्षा के लिए लगाया गया । उस समय परिवार आनंद भवन में रहता था , जो की एकदम भयंकर भौकाल महल था और मोतीलाल नेहरु ने हाल में ही बनवाया था ।

ब्रुक्स भी उनके साथ आनंद भवन में ही रहते थे । इस आदमी की संगती ने नेहरु को कई तरह से प्रभावित किया। पहली बात तो यह कि इन्हें किताबें पढ़ने की चाट लग गई और उन्हें केरोल तथा किपलिंग की किताबें खास तौर पर पसंद आईं और सर्वेंटीज का उपन्यास ‘डान क्विकटाज’ इन्हीं दिनों पढ़ा ।

दूसरा यह की ब्रुक्स ने भाईसाहब को विज्ञान से परिचित  करवाया । जवाहरलाल नेहरु ने लिखा है कि आनंद भवन में ही विज्ञान की प्रयोगशाला खड़ी की गई, जिसमें वह घण्टों वस्तु-विज्ञान और रसायन-शास्त्र के एक्सपेरिमेंट किया करते थे ।

तीसरी बात यह की इसी दौरान जवाहरलाल पर थियोसाफी का भूत सवार हुआ और जो की कुछ समय तक बड़े जोर से सवार रहा ।

मई 1905 में उन्हें पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया वहां हमारे भाईसाहब लंदन के हैरो स्कूल में भर्ती हो गए। इस स्कुल में अंग्रेज लार्ड और रईसों के बच्चे पढ़ते थे। हिन्दुस्तानी राजे -महाराजे और नवाबों के बच्चे भी नार्मली वहीं पढ़ने जाया करते थे । जब जवाहरलाल वहां गए तब पहले से करीब चार-पांच हिन्दुस्तानी लड़के वहां पर पढ़ रहे थे। उनमें से एक महाराज बड़ौदा का लड़का था , जो नेहरु से बहुत आगे था । दूसरा लड़का महाराजा कपुरथला का बड़ा बेटा परमजीत सिंह था । उसका स्वभाव बड़ा ही अजीब था । लड़के उसके तौर तरीकों का मजाक उड़ाते थे तो वह धमकी देता था कि जब तुम कपुरथला आओगे , तब मैं तुम्हारी खबर लूंगा। इस पर उसकी और भी हंसी उड़ती थी ।

1905 के अंत में ब्रिटिश पार्लियामेंट के चुनाव हुए , जिसमें लिबरल पार्टी की भारी जीत हुई। नेहरु नें उसमें इतनी दिलचस्पी ली कि संसदीय चुनाव प्रणाली को बखूबी समझ लिया।

दो बरस हैरो में बिताकर जवाहरलाल अक्टूबर 1907 में केम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में पहुँच गये. तब उनकी उम्र सत्रह-अठारह बरस के करीब थी. ज़िन्दगी ने लड़कपन बिताकर जवानी की देहरी पर कदम रखा था. और लिखा है – ‘’मैं ऐंठ के साथ केम्ब्रिज के विशाल भवनों और उसकी तंग गलियों में चक्कर काटा करता और यदि कोई जान-पहचान वाला मिल जाता था तो बड़ा खुश हो जाता था.’’

जवाहरलाल ने अपने पर इस वातावरण के प्रभाव को ‘मेरी कहानी’ में यों व्यक्त किया है – ‘’मेरा रुझान जीवन का सर्वोत्तम उपभोग करने और उसका पूरा तथा विविध आनंद लेने की ओर था. मैं जीवन का उपभोग करता था और इस बात से इनकार करता था कि मैं उसमें पाप की कोई बात क्यों समझूँ ? साथ ही खतरे और साहस के काम भी मुझे अपनी ओर आकर्षित करते थे. पिताजी के तरह में भी उस वक़्त कुछ हद तक एक जुआरी था. पहले अपने रूपये का जुआरी और फिर बड़ी-बड़ी बाजियों का – जीवन के बड़े-बड़े आदर्शों का.’’ सारांश यह है कि जवाहरलाल के संस्कार वही थे, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के चहेते बेटों के.

जवाहरलाल जितने दिन इंग्लैंड में रहे, उनमें जीवन के सर्वोत्तम उपभोग और विविध आनंद लेने का रुझान बराबर बढ़ता रहा. 1910 में केम्ब्रिज से वह डिग्री लेकर निकले और कानून पढ़ने के लिए इनर टैम्पिल में भर्ती हुए. वहां उन्हें हैरो के कुछ पुराने दोस्त मिलें. उनके साथ रहने से जवाहरलाल की आदतें और भी खर्चीली हो गई. बाप खर्च के लिए काफी पैसा भेजता था, पर बेटा उससे ज्यादा खर्च कर डालता था. पैसे की कमी नहीं थी और विलासिता के सभी साधन मयस्सर थे.

केम्ब्रिज से निकलने के बाद जवाहरलाल के सामने यह सवाल आया कि उन्हें कौन-सा ‘कैरियर’ चुनना चाहिए तो बहुत सोच-समझकर बाप का पेशा अपनाने का निर्णय लिया. वकालत पढ़ने में उन्हें खास दिक्कत नहीं हुई. इन दो सालों में वह लंदन में खूब इधर-उधर घूमे, आयरलैंड गए और जर्मनी, फ्रांस, आदि यूरोप के देशों का भी भ्रमण किया.

1912 में उन्होंने ने बैरिस्टरी पास की और सात साल बाद इंग्लैंड से घर की ओर चले. वह हिन्दुस्तानी कम अंग्रेज ज्यादा थे.

 

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