कहते हैं, ”होनी को कौन टाल सकता है.” यह सच भी है जो होना होता है वो किसी-ना-किसी रूप में हो ही जाता है. जीवन और मौत दोनों ही ऊपरवाले यानि भगवान के हाथों में होता है. कल कुछ ऐसा ही हुआ. हम सबके प्रिय कवि, पद्मभूषण, ज्ञानपीठ वरिष्ठ कवि ‘श्री कुँवर नारायण’ श्वांस के छंद से मुक्त हो कर सुर के महालोक की प्रयाण कर गए ! संभव हो तो अपनी रचना में रची-बसी इसी आस्था से लबरेज़ लौट आना हमारे प्रिय कवि.

अबकी बार लौटा तो ,बृहत्तर लौटूंगा
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं,
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं,
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को,
तरेर कर न देखूंगा उन्हें,
भूखी शेर-आँखों से ||

अबकी बार लौटा तो, मनुष्यतर लौटूंगा
घर से निकलते,
सड़को पर चलते,
बसों पर चढ़ते,
ट्रेनें पकड़ते,
जगह बेजगह कुचला पड़ा,
पिद्दी-सा जानवर नहीं ||

अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूंगा||

अबकी बार लौटा तो ,हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता,
पूर्णतर लौटूंगा ||

श्री कुँवर नारायण का जन्म19 सितंबर 1927 को हुआ. नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के प्रमुख कवियों में रहे हैं.  कुँवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहासऔर मिथक के जरिये वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है. कुंवर नारायण का रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं.

यद्यपि कुंवर नारायण की मूल विधा कविता रही है पर इसके अलावा उन्होंने कहानी,लेखव समीक्षाओं के साथ-साथसिनेमा,रंगमंचएवं अन्य कलाओं पर भी बखूबी लेखनी चलायीै. इसके चलते जहाँ उनके लेखन में सहज संप्रेषणीयता आई वहीं वेप्रयोगधर्मी भी बने रहे. उनकी कविताओं-कहानियों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है.

‘तनाव‘ पत्रिका केलिए उन्होंने कवाफी तथा ब्रोर्खेस की कविताओं का भी अनुवाद किया है. 2009 में कुँवर नारायण को वर्ष 2005 के लिए देश के साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. कवि जीवन परिचय उन्होने इंटर तक की. पहले माँ और फिर बहन की असामयिक मौत ने उनकी अन्तरात्माको झकझोर कर रख दिया, पर टूट कर भी जुड़ जाना उन्होंने सीख लिया था.

पैतृक रूप में उनका कार का व्यवसाय था, पर इसके साथ उन्होंने साहित्य की दुनिया में भी प्रवेश करना मुनासिब समझा. इसके पीछे वे कारण गिनाते हैं कि साहित्य का धंधा न करना पड़े इसलिए समानान्तर रूप से अपना पैतृक धंधा भी चलाना उचित समझा. साहित्य यात्रा एम०एम० करने के ठीक पाँच वर्ष बाद उनका प्रथम काव्य संग्रह चक्रव्यूह नाम से प्रकाशित हुआ.

अल्प समय में ही अपनी प्रयोग धर्मिता के चलते उन्होंने पहचान स्थापित कर ली और नतीजन अज्ञेय जी ने वर्ष 1949 में उनकी कविताओं को केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और विजयदेव नारायण साही के साथ ‘तीसरा सप्तक‘में शामिल किया. यहाँ से उन्हें काफी प्रसिद्धि मिली.

आत्मजयी‘जैसे प्रबंध काव्य के प्रकाशन के साथ ही कुंवर नारायण ने असीम संभावनाओं वाले कवि के रूप में पहचान बना ली. उनकी काव्ययात्रा ‘चक्रव्यूह’ से शुरू हुई. इसके साथ ही उन्होंने हिन्दी के काव्य पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की. उनके संग्रह ‘परिवेश हम तुम’ के माध्यम से मानवीय संबंधों की एक विरल व्याख्या हम सबके सामने आई.

उन्होंने अपने प्रबंध ‘आत्मजयी’ में मृत्यु संबंधी शाश्वत समस्या को कठोपनिषद का माध्यम बनाकर अद्भुत व्याख्या के साथ हमारे सामने रखा. इसमें नचिकेता अपने पिता की आज्ञा, ‘मृत्य वे त्वा ददामीति’ अर्थात मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ, को शिरोधार्य करके यम के द्वार पर चला जाता है, जहाँ वह तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहकर यमराज के घर लौटने की प्रतीक्षा करता है.

उसकी इस साधना से प्रसन्न होकर यमराज उसे तीन वरदान माँगने की अनुमति देते हैं. नचिकेता इनमें से पहला वरदान यह माँगता है कि उसके पिता वाजश्रवा का क्रोध समाप्त हो जाए. नचिकेता के इसी कथन को आधार बनाकर कुँवर नारायणजी की जो कृति 2008 में आई, ‘वाजश्रवा के बहाने’, उसमें उन्होंने पिता वाजश्रवा के मन में जो उद्वेलन चलता रहा उसे अत्यधिक सात्विक शब्दावली में काव्यबद्ध किया है. इस कृति की विरल विशेषता यह है कि ‘अमूर्त’को एक अत्यधिक सूक्ष्म संवेदनात्मक शब्दावली देकर नई उत्साह परख जिजीविषा को वाणी दी है.

जहाँ एक ओर आत्मजयी में कुँवर नारायण जीने मृत्यु जैसे विषय का निर्वचन किया है, वहीं इसके ठीक विपरीत ‘वाजश्रवा के बहाने’ कृति में अपनी विधायक संवेदना के साथजीवन के आलोक को रेखांकित किया है. यह कृति आज के इस बर्बर समय में भटकती हुई मानसिकता को न केवल राहत देती है, बल्कि यह प्रेरणा भीदेती है कि दो पीढ़ियों के बीच समन्वय बनाए रखने का समझदार ढंग क्या हो सकता है.

कवि ‘श्री कुँवर नारायण’ को हमारी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि. भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें !

 

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