हमारे देश में भिन्न-भिन्न प्रकार के जाति और धर्म हैं. अलग-अलग समुदाय के लोग यहाँ निवास करते हैं. सबकी अपनी पहचान और इतिहास है. इन्हीं जाति में एक जाति है ”भूमिहार”. इस जाति का एक बड़ा हिस्सा हमारे देश में निवास करता है. ये जाति ब्राह्मण समोदय का प्रमुख अंग है. आईये जानते है इनके इतिहास और कुछ रोचक जानकारियों को :

हमारे देश आर्यावर्त में 7200 विक्रम सम्वत् पूर्व देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा हेतु एक विराट युद्ध राजा सहस्रबाहु सहित समस्त आर्यावर्त के 21 राज्यों के क्षत्रिय राजाओं के विरूद्ध हुआ, जिसका नेतृत्व ऋषि जमदग्नि के पुत्र ब्रह्मऋषि भगवान परशुराम ने किया, इस युद्ध में आर्यावर्त के अधिकतर ब्राह्मणों ने भाग लिया और इस युद्ध में भगवान परशुराम की विजय हुई तथा इस युद्ध के उपरान्त अधिकतर ब्राह्मण अपना धर्मशास्त्र एवं ज्योतिषादि का कार्य त्यागकर समय-समय पर कृषि क्षेत्र में संलग्न होते गये, जिन्हें अयाचक ब्राह्मण व खांडवायन या भूमिहार कहा जाने लगा. जोकि कालान्तर में त्यागी, भूमिहार, महियाल, पुष्करणा, गालव, चितपावन, नम्बूदरीपाद, नियोगी, अनाविल, कार्वे, राव, हेगडे, अयंगर एवं अय्यर आदि कई अन्य उपनामों से पहचाने जाने लगे.

त्यागी अर्थात् भूमिहार आदि ब्रह्मऋषि वंशज यानि अयाचक ब्राह्मणों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में विभिन्न उपनामों जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान के कुछ भागों में त्यागी, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार व बंगाल में भूमिहार, जम्मू कश्मीर, पंजाब व हरियाणा के कुछ भागों में महियाल, मध्य प्रदेश व राजस्थान में गालव, गुजरात में अनाविल, महाराष्ट्र में चितपावन एवं कार्वे, कर्नाटक में अयंगर एवं हेगडे, केरल में नम्बूदरीपाद, तमिलनाडु में अयंगर एवं अय्यर, आंध्र प्रदेश में नियोगी एवं राव तथा उड़ीसा में दास एवं मिश्र आदि उपनामों से जाना जाता है.

अयाचक ब्राह्मण अपने विभिन्न नामों के साथ भिन्न भिन्न क्षेत्रों में अभी तक तो अधिकतर कृषि कार्य करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं.

भूमिहार या ब्राह्मण (अयाचक ब्राह्मण) एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है. बिहार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात् अयाचक ब्राह्मणों को त्यागी नाम की उप-जाति से जाना व पहचाना जाता है. मगध के महान पुष्य मित्र शुंग और कण्व वंश दोनों ही ब्राह्मण राजवंश भूमिहार ब्राह्मण (बाभन) के थे भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है.

भूमिहार ब्राह्मण समाज में कुल 10 उपाधि है-
1-पाण्डेय
2-तिवारी/त्रिपाठी
3- मिश्र
4-शुक्ल
5-यजी
6-करजी
7-उपाध्याय
8-शर्मा
9-ओझा
10-दुबे\द्विवेदी

इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारण एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय ,शाही ,सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही , सिंह (सिन्हा) , चौधरी , ठाकुर आदि बिहार में लिखने लगा बहुत से भूमिहार या बाभन/बामन भी लिखते हैं.

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन ही है. प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगो को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया,उसके बाद सारस्वत , पुष्करणा, महियल , सरयूपारीण , मैथिल(झा) , चितपावन , कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए, मगध के ब्राह्मण और मिथिलांचल के पश्चिम तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार गाँव में ही सम्मिलित होते गए.

भूमिहार ब्राह्मण के कुछ मूलों ( कूरी ) के लोगो का भूमिहार ब्राह्मण रूप में संगठित होने की एक सूची यहाँ है :

1. कान्यकुब्ज शाखा से :- दोनवार ,सकरवार,किन्वार, ततिहा , ननहुलिया, वंशवार के तिवारी, कुढ़ानिया, दसिकर, आदि.

2. सरयूपारी शाखा से : – गौतम, कोल्हा (कश्यप), नैनीजोर के तिवारी , पूसारोड (दरभंगा) खीरी से आये पराशर गोत्री पांडे, मुजफ्फरपुर में मथुरापुर के गर्ग गोत्री शुक्ल, गाजीपुर के भारद्वाजी, मचियाओं और खोर के पांडे, म्लाओं के सांकृत गोत्री पांडे, इलाहबाद के वत्स गोत्री गाना मिश्र ,राजस्थान आदि पश्चिमोत्तर क्षेत्र के पुष्करणा – पुष्टिकरणा – पुष्टिकर ब्राह्मण आदि !!

3. मैथिल शाखा से : – मैथिल शाखा से बिहार में बसने वाले कई मूल के भूमिहार ब्राह्मण आये हैं. इनमे सवर्ण गोत्री बेमुवार और शांडिल्य गोत्री दिघवय – दिघ्वैत और दिघ्वय संदलपुर प्रमुख है.

4. महियालो से : – महियालो की बाली शाखा के पराशर गोत्री ब्राह्मण पंडित जगनाथ दीक्षित छपरा (बिहार) में एकसार स्थान पर बस गए. एकसार में प्रथम वास करने से वैशाली, मुजफ्फरपुर, चैनपुर, समस्तीपुर, छपरा, परसगढ़, सुरसंड, गौरैया कोठी, गमिरार, बहलालपुर , आदि गाँव में बसे हुए पराशर गोत्री एक्सरिया मूल के भूमिहार ब्राह्मण हो गए.

5. चित्पावन से : – न्याय भट्ट नामक चितपावन ब्राह्मण सपरिवार श्राध हेतु गया कभी पूर्व काल में आये थे.अयाचक ब्राह्मण होने से इन्होने अपनी पोती का विवाह मगध के इक्किल परगने में वत्स गोत्री दोनवार के पुत्र उदय भान पांडे से कर दिया और भूमिहार ब्राह्मण हो गए.पटना डाल्टनगंज रोड पर धरहरा,भरतपुर आदि कई गाँव में तथा दुमका , भोजपुर , रोहतास के कई गाँव में ये चितपावन मूल के कौन्डिल्य गोत्री अथर्व भूमिहार ब्राह्मण रहते हैं!

6. पुष्करणा / पुष्टिकर से : सिंध, बलोचिस्तान, अविभाजित पंजाब, राजस्थान और गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र में बसने वाले अयाचक ब्राह्मण समूह पुष्करणा ब्राह्मण भी भूमिहार ब्राह्मण यानि अयाचक ब्राह्मण समुदाय ही हैं.
भारतीय इतिहास में सिंध – थार के साम्राज्य पर मोहम्मद बिन कासिम के अरब मुस्लिम आक्रमण से पहले का आखिरी ब्राह्मण सम्राट “राजा दाहिरसेन” पुष्करणा ब्राह्मण ही था, पुष्करणा ब्राह्मण शुरूआत से ही कृषि – व्यापार – अध्यापन – ज्योतिष विज्ञान – धर्म शास्त्र व ग्रंथ टीका रचनाओं – सैन्य कार्य – प्रशासन – जमींदारी – दीवानी आदि से जुडे कार्य करते हुऐ भूमिहार रहे हैं. पुष्करणा ब्राह्मण पुरोहिती – कर्मकांड / याचक द्वारा जीवन यापन नहीं करते रहे हैं.

भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था..याचक ब्राह्मणों के एक दल ने ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं,फिर हममे और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा.काफी विचार विमर्श के बाद ” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द अस्तित्व में आया.”

मेरा पुष्करणा ब्राह्मण समाज भी प्राचीनतम भारतीय हिंदू ब्राह्मण समुदाय है और पुष्करणा / पुष्टिकरणा ब्राह्मण समाज भी भूमिहार ब्राह्मण यानि अयाचक ब्राह्मण समाज है. 

भूमिहार ब्राह्मणों के पूर्वांचली प्रमुख सरनेम इस प्रकार हैं:

1.) बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में- भूमिहार
2.) पंजाब एवं हरियाणा में – मोहयाल

3.) जम्मू कश्मीर में – पंडित, सप्रू, कौल, दार / डार , काटजू आदि

4.) मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश में आगरा के निकटस्थ – गालव
5.) उत्तर प्रदेश में – त्यागी एवं भूमिहार।
6.) गुजरात में – अनाविल ;देसाई जोशी, मेहताद्ध – मेहता
7.) महाराष्ट्र में – चितपावन
8.) कर्नाटक में – चितपावन
9.) पश्चिमी बंगाल – भादुड़ी, चक्रवर्ती, गांगुली, मैत्रा, सान्याल आदि।

10.) उड़ीसा में – दास, मिश्र
11.) तमिलनाडू में – अयर, आयंगर
12.) केरल में – नंबूदरीपाद

13.) राजस्थान में – बांगर, पुष्कर्णा/पुष्टिकरणा /पुष्कर्ण, पुरोहित, रंग/ रंगा एवं रूद्र, बागड़ा.”

14.) आन्ध्रप्रदेश में – राव और नियोगी।

कुछ विद्वानों का सुझाव है कि भूमिहार उन ब्राह्मणों में एक है जिनकी गंगा के मैदान में इतिहास के विभिन्न अवधियों के माध्यम से भूमि और राजनीतिक सत्ता पर पकड़ थी, उसी तरह सरस्वती नदी सहित अन्य नदियां जो पश्चिमी सीमांत पंजाब सिंध गुजरात में बहती थी के क्षेत्र में सारस्वत एवं पुष्टिकर पुष्करणा जातियों के लोग रहते थे. सिंधु नदी के भेद से सैंधु मणेचा भेद की भी स्थिति रही थी। द्रव (पानी) द्रविड़ पुष्करिणी (नदी) तथा पुष्टिकर परंपरा के साथ जुड़े समूह नाम हैं. सारस्वत की यात्रा केरल तक हुई थी जबकि पुष्टिकर समुदाय महाराष्ट्र की आरंभिक सीमा से आगे नहीं निकला था.

क्षेत्र दृष्टि से पंच द्रविड़ परंपरा के गुण अधिक हैं. विगत 1200 वर्ष के कालखंड में जब विदेशी आक्रमणकारियों का प्रभाव रहा है तो सिंध प्रांत के पुष्टिकर मुस्लिम भी बने तथा बगदाद में गणित ज्योतिष विज्ञान भी लेकर गए और राजस्थान की ओर भी पलायन हुआ. काशी की पुष्टि तथा वहां पीठ की बात भी परंपरा में है जो सरस्वती के लुप्त पोखर रूप में होने पर बनी तथा प्रयाग की तीसरी नदी की परंपरा भी वहीं से बनी है. विद्यानुरागी व संतोषी वृत्ति की पहचान भी उचित है. उष्ट्रवाहिनी थार से बलूच या आगे तक की/से यात्रा व पलायन को दर्शाती है. तदुपरांत वैष्णव परंपरा को अपनाते हुए समुदाय की पहचान जय श्री कृष्ण से भी दर्शाती है.

भूमिहार ब्राह्मणों के इतिहास को पढने से पता चलता है की अधिकांश समाजशास्त्रियों ने भूमिहार ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज की शाखा माना है.भूमिहार ब्राह्मण का मूलस्थान मदारपुर है जो कानपुर – फरूखाबाद की सीमा पर बिल्हौर स्टेशन के पास है. 1528 में बाबर ने मदारपुर पर अचानक आक्रमण कर दिया.इस भीषण युद्ध में वहाँ के ब्राह्मणों सहित सब लोग मार डाले गए इस हत्याकांड से किसी प्रकार अनंतराम ब्राह्मण की पत्नी बच निकली थी जो बाद में एक बालक को जन्म दे कर इस लोक से चली गई , इस बालक का नाम गर्भू तिवारी रखा गया!!

गर्भू तिवारी के खानदान के लोग कान्यकुब्ज प्रदेश के अनेक गाँव में बसते है.कालांतर में इनके वंशज उत्तर प्रदेश तथा बिहार के विभिन्न गाँव में बस गए,गर्भू तिवारी के वंशज भूमिहार ब्राह्मण कहलाये इनसे वैवाहिक संपर्क रखने वाले समस्त ब्राह्मण भी कालांतर में भूमिहार ब्राह्मण कहलाये!

अंग्रेजो ने यहाँ के सामाजिक स्तर का गहन अध्ययन कर अपने गजेटियरों एवं अन्य पुस्तकों में भूमिहारो के उपवर्गों का उल्लेख किया है, गढ़वाल काल के बाद मुसलमानों से त्रस्त भूमिहार ब्राह्मणों ने जब कान्यकुब्ज क्षेत्र से पूर्व की ओर पलायन प्रारंभ किया और अपनी सुविधानुसार यत्र तत्र बस गए तो अनेक उपवर्गों के नाम से संबोधित होने लगे,यथा – ड्रोनवार , गौतम , कान्यकुब्ज , जेथारिया आदि अनेक कारणों,अनेक रीतियों से उपवर्गों का नामकरण किया गया.कुछ लोगो ने अपने आदि पुरुष से अपना नामकरण किया और कुछ लोगो ने गोत्र से कुछ का नामकरण उनके स्थान से हुवा जैसे – सोनभद्र नदी के किनारे रहने वालो का नाम सोन भरिया, सरस्वती नदी के किनारे वाले सर्वारिया,,सरयू नदी के पार वाले सरयूपारी , आद् मूलडीह के नाम पर भी कुछ लोगो का नामकरण हुआ जैसे जेथारिया , हीरापुर पण्डे ,वेलौचे ,मचैया पाण्डे , कुसुमि तेवरी , ब्रह्मपुरिये , दीक्षित , जुझौतिया आदि.

इस समुदाय का इतिहास बहुत बड़ा और जटिल है किन्तु रोचक भी है. आप भी इस जाति के रहस्यमयी तथ्य को अवश्य जानिए या जानने की कोशिश कीजिये.

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