किस्सा / नवीन गुप्ता – The Bhaiyaji Special

एक किस्सा है वस्त्र का,
और गंदी नज़रो का |
मैं सुनाता हूँ कि दिल्ली सड़क,
लंबी चौड़ी, गहरा काला धुवां ||

फिर उसपर दौड़ती ऑटो रफ़्तार,
एक पुल गुज़रता |
नही है उसके पार उजला,

सारे स्ट्रीट लाइट बंद ||
हल्की सुबह अंधियारे का वक़्त,
पीछे से रफ़्तार में पल्सर,
बहुत तेज़ पीछा करती ||

यूँ उसपर बैठे दो निर्लज मानुस,
और गंदी नज़रो का खेल शुरू |
फटाक से दोनो लड़कों का सिर,
नब्बे कोण घूमा ||

क्या तो तीखी लड़की है,
वन पीस वस्त्र उसपर ये नशीली आंखे |
डरा धमकाकर रोका उसको,
ऑटो वाला गया भाग ||

लड़की बचाओ से कहारने लगी,
हाथ पैर मारती जूझ रही |
घिनौनी हरकतों के चाटो से,
उसके मुख का कपड़ा छिन गया ||

फिर तस्वीर ही बदल गई,
पूरे दृश्य की, शख़्ते में आ गए|
निर्लज लड़के, देख उसका चेहरा,
ऐसा कैसा चेहरा निकला ||

लड़को की नज़रे शर्मिन्दगी से भर गई,
पछतावा होता दिख रहा |
उसके वस्त्र को देखकर,
उन दोनों के मन में जो ||

नीच भावना उत्पन्न हुई थी,
किलप गई |
उस लड़की के चेहरे पर,
एसिड फेका था किसी ने ||

 

इस कविता को लिखा है नविन गुप्ता ने | नविन, सतना, मध्य प्रदेश के रहनेवाले हैं  | 

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