Poem on Diwali by Bhaiyaji

 

मेरे शहर में दीपों से सजी है,
पटाखे फूट रहें हैं, छुरछुरी बम्ब को हाथ से जलाता हूं,
फुलझड़ी बहुत पसंद हैं, मिठाई भी पसंद है |

ब्रेकिंग न्यूज लिखता हूं,
फला व्हीआईपी ने मनाया दिवाली,
दफ्तर से घर जाते वक्त फुटपाथ पर पड़े लोग दिखते हैं |

क्यों नही एकेक को लेकर चले अपने घर,
कुछ बेबश हैं गरीबी से, कुछ बेहोश है मधुशाला में,
सबकुछ हो रहा एक ही देश में,
अबकी बार एक दिवाली ऐसी भी मन रही है |

चलोे उन लोगों को लेकर चले घर.
एक ही एक कर, जो रहते रोड लाइट पर
जो झुमर का नही लिया सुख है
अबकी बार एक दिवाली ऐसी भी….

इस बार यह अहसास है,
लिखता रहा हूं, ये खबर खास है |

इस साल त्योहार पर न जाऊंगा घर,
क्योंकि दिवाली के दिन का निकालूंगा अखबार |

मैं दिवाली बनाऊंगा,लेकिन बचपन के यादों के साथ
क्योंकि मैं पत्र का बनाता कार हूं,
मेरी मां के आंसू कहते हैं कि मैं पत्रकार हूं,
मेरी दिवाली मां से है मां कि दिवाली मुझसे…..

अबकी बार एक दिवाली ऐसी भी ||

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